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Lazy Scribbles.

Some random thoughts, some blabbering, some prose, and some poetry.
Work is in progress.

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रोता शहर

रोता शहर

बता ए शहर तुझे हुआ क्या है,शमशान में नहीं थमता धुआं सा हैबहती लाशें, चुभते मंजरअभी भी तेरे शहर में दिल हैं बंजर आज देखा मैंने तेरा राजा रोता सा है,खोखली बातें मगर बोलता तोता सा है !जब लगी थी आग, तेरा पहरेदार सोता सा हैइसीलिए ए शहर,यहाँ मुर्दों का जमघट जमा होता सा है … Continue reading रोता शहर

खर्राटे

रात की ये तन्हा उदासी,उसमे मधुर संगीत तुम्हारे खर्राटेऐसे सुरमई तुम्हारे खर्राटेमानो म्यूजिशियन गिटार बजातेनए सुर पकड़, नयी तान सुनातेदिल बहलाते तुम्हारे खर्राटे रात की ये शांत वीरनियत,उसे चीरते तुम्हारे खर्राटेऐसे गूंजते तुम्हारे खर्राटेमानो बंजर जमीन पे ट्रेक्टर चलाते अंत में रात में यूँ पसरा सन्नाटा,इक चोर झांके, मिले माल झन्नाटामगर तुम्हरे खर्राटों से उसका … Continue reading खर्राटे

Her

Sitting in my iron chair,Fiddling with her messy hair,She would often raise her ‘browsChecking out what? Who knows! I remember an innocent girl once, Asking me to maintain distance.And now she drives many miles,To make me adjust her contact lens. How things have changed, From asking to split the bill,to making me gift her a … Continue reading Her

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